कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

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सोमवार, 26 दिसंबर 2022

रिवर्स फायर

राकेश राय ( Rakesh Raj ) का डेढ़ सौ पेज का उपन्यास 'रिवर्स फायर' मैं तीन-चार बैठकी में पढ़ गया। एक सांस में पढ़ ली जाने वाली किताबों में इसे शामिल किया जा सकता है। यह एक पिस्टल की आत्मकथा है, जो जयंत नामक व्यक्ति के यहां जन्म लेती है और कई हाथों में घूमती कई लोगों को शिकार बनाती अंततः अपने पहले मालिक जयंत को भी अपना शिकार बनाती है। इसी अर्थ में यह रिवर्स फायर है। 
घोषित तौर पर उपन्यास का लक्ष्य यह सिद्ध करना है कि हथियारों से दुनिया में किसी का भला नहीं हो सकता, उसके मालिकों का तो कतई नहीं। 
उपन्यास के जिन पात्रों के हाथ में पिस्टल लगती है वह सब किसी न किसी मजबूरी में ही उसका प्रयोग करते हैं और सिद्ध यह होता है कि हिंसा सामाजिक, आर्थिक और मानसिक उपक्रमों की उपज होती है। जन्म से कोई हिंसक नहीं होता। हां, किसी समस्या से निजात पाने की हड़बड़ी में अचूक उपाय के रूप में जो लोग इस हथियार को हासिल करने की जुगत भिड़ा उसका प्रयोग करते हैं वे अशिक्षा ग्रस्त समाज का हिस्सा हैं। 
उपन्यास के सारे पात्र ग्रामीण और कस्बाई पृष्ठभूमि के हैं। उनमें अधिकांश पेशेवर अपराधी नहीं हैं। उपन्यास अपराध के प्राथमिक कारकों की सफल विवेचना करता है। यह एक तरह से किशोर से युवा होते वर्ग के तनाव और तनावजनित हिंसा को अपना आधार बनाता है। 
उपन्यास के पात्र जिनके हाथों में पिस्टल घूमती है उनकी रोचक कहानियों का संकलन सा है यह। इनमें जैक्सन चोर की कहानी विस्तृत है और प्रभावी भी। जैक्सन की कहानी दर्शाती है कि किस तरह एक सामान्य जीवन जी रहे व्यक्ति को समय के संकट ध्वस्त करते हैं और अपनी जमीन से बेदखल किया जाकर वह अपनी जाति, बिरादरी, धर्म को खोता हुआ अंततः अपने गांव को छोड़ एक बंजारे में तब्दील हो जाता है। 
उपन्यास समाज के निम्न मध्यवर्गीय हिस्से के संकटों के आर्थिक कारकों की शिनाख्त करता है। उपन्यास को उसके स्थापत्य के आधार पर चेतन भगत और गुलशन नंदा के मध्य की कड़ी के रूप में रखा जा सकता है। आगे राकेश ज्यादा समर्थ ढंग से नई विश्लेषणात्मक जमीन को अपना आधार बनाएंगे यह आशा उनसे की जा सकती है।

32000 साल पहले

Rakesh Raj के रोचक उपन्यास 'रिवर्स फायर' से गुजरने के बाद Ratneshwar Singh के उपन्यास '32000 साल पहले' से गुजरना काफी थकाने वाला साबित हुआ। यह किताब भेंट में मिली थी तो उसे पढ़कर राय जाहिर करने का दबाव था, नहीं तो सहज जंग से 10 पेज पढ़ पाना भी मेरे लिए कठिन होता।  

उपन्यास की सामग्री किशोर स्तर की है और भाषा के लिहाज से यह किशोरों के लिए भी बहुत नीरस है। 
 
कुछ शोध अनुमानों को लेकर कल्पना की जो उड़ान रत्नेश्वर ने भरी है उसमें एक पक्ष की नायिका गरुड़ जैसे पक्षी पर उड़ान भरती है तो दूसरे शत्रु पक्ष के लोग सिंह और भेड़ियों पर सवार होकर हमला करते हैं। 
 
ऐसा माना जाता है कि हमारा बोला हुआ हर शब्द वातावरण में मौजूद रहता है। इसी को आधार बनाकर यह उपन्यास रचा गया है। उपन्यास के पात्र अपने वैज्ञानिक उपकरणों से 32000 साल पहले के मनुष्यों की आवाजों को डीकोड करते हैं और उस काल की कथा आकार पाती है। उपन्यास गरुड़ की सवारी करने वाले किन्नर कबीले और सिंह और भेड़ियों की सवारी करने वाले परा कबीले के युद्ध से आरंभ होता है। आगे परा के हमलों से खुद को बचाने को पांच कबीले एक होकर परा को नष्ट करने की योजना बनाते हैं। बीच में मैमथ के शिकार पर एक अध्याय है। अंत तक आते-आते उपन्यासकार प्रेम की महिमा प्रकट करने में लग जाता है और परा को प्रेम से जीत लेने का भाव पैदा होता है। इसके आगे उपन्यास जारी है, मतलब दूसरे भावी अप्रकाश्य भाग में कहानी आगे बढ़ेगी। 
 
उपन्यास को पढ़ते हुए कुछ चालू अंग्रेजी फिल्मों की फंतासी दिमाग में उभरती है। पक्षियों पर उड़ान भरने, मैमथ का शिकार करने और ईसा मसीह की मृत्यु दंड पर आधारित फिल्मों से लिए गए कुछ दृश्य जहां-तहां जड़े गए से लगते हैं। 
 
आह, ओह, आउच की शैली में लिखा गया यह उपन्यास अगर फिल्माया जाए तो अंग्रेजी चालू फिल्मों जैसा कुछ मनोरंजन संभव है। 
 
उपन्यास में कुछ विचित्र शब्दों का प्रयोग जहां-तहां है। जैसे, बिग भूकंप, पता नहीं यह क्या है, शायद यह बिग बैंग की पैरोडी है। 
 
दो मित्रों की राय इस किताब पर मैंने जानने की कोशिश की, पर उनमें कोई भी किताब के दस पेज भी पढ़ने की हिम्मत नहीं दिखा सका। यूं मेरे और मेरे मित्रों की समझ की सीमा है, मित्र रत्नेश्वर माफ करेंगे।

 

सोमवार, 5 जून 2017

प्रियंबद - छुटटी के दिन का कोरस


'छुटटी के दिन का कोरस' विन्सेंट डगलस यानि विवान के 1947 की ऐतिहासिक तारीख के दोनों ओर फैले जीवन की बिखरी स्मृतियों का कोलाज है। इस कोलाज में इतिहास और यथार्थ, स्वप्न और जीवन, कल्पना और वास्तविकता एक दूसरे पर ओवरलैपिंग करते नजर आते हैं और इस सब से उपजा दर्शन इस कोलाज को जोडे रखता है। इस कोलाज में बैठा विवान सोचता है कि अक्सर हम ऐसी प्रतीक्षाएं करते हैं जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे कभी नहीं मिलतीं। विवान के लिए स्मृतियां ही यथार्थ हैं क्योंकि वे निष्कवच हैं। कि जो पवित्र दिखता है उसका षडयंत्र अपवित्र अंधेरी घाटियों में चलता रहता है। विवान के बहाने उपन्यासकार जैसे शंकर के मायावाद को फिर फिर रचना चाहता है पर उस माया को विच्छिन्न करने वाले सूत्रों को सामने आने से वह रोक नहीं पाता। हम सभी जानते हैं कि सच झूठ,पवित्र अपवित्र अगर संदर्भ रहित हों तो मात्र जुमले हैं, कि स्मृति का यथार्थ स्मृति का यथार्थ होता है जीवन के यथार्थ को वह धूमिल नहीं कर सकता।
इस उपन्यास में विवान के बहाने जितने बडे कालखंड को उपन्यासकार रचना चाहता है वह उसके अध्ययन और आत्मविश्वास से ही संभव हो पाता है अब वहां कहंा तक रच पाता है इसे भी वह जानता है इसलिए उसे कोरस ही कह पाता है और वह भी छुटटी के दिन का। इस कोरस की लय जहां तहां टूटती है पर हर बार उपन्यासकार उसे संभाल लेता है। विवान के बिखरे जीवन में जितने रंग हैं उतने एक साथ किसी एक उपन्यास में लाना उपन्यासकार की सफलता है। ये विवरण जीवन के फैले बहुआयामी यथार्थ से हमारा परिचय कराते हैं भले वे किसी निष्कर्ष तक ना पहुंचाते हों। आखिर यह मन और स्मृति की एक दिन की उडान ही तो है। इस लिहाज से यह एक दिन आत्मविश्लेषण का निर्णायक दिन है और इस एक दिन में विवान अपने जीवन और इतिहास का विश्लेषण कर जाता है।
उपन्यास में आए अनेक पात्रों के मनोजगत में लेखक गहरे उतरता है और नये नये रहस्य उजागर करता है और एक जगह तो वह अपने मुख्य पात्र के मनो जगत की छानबीन की भी नाटकीय कोशिश करता है जो अंततः एक तमाशे से ज्यादा प्रभाव नहीं छोड पाता। उपन्यास में गालिब जहां तहां शिरकत करते हैं और उपन्यास को एक लय प्रदान कर जाते हैं। आम भारतीय मानस की अच्छी पडताल है उपन्यास में अब वह परंपरिक परिवारों के भीतर चल रही प्रेम पच्चीसियां हों या आम हिस्टिरियाक चरित्रों का चित्रण। हां उपन्यास में जिस तरह हर पडाव पर एक यौन दृश्य को रचा गया है वह उसके ऐतिहासिक चरित्र को बाधित करता है।
कुल मिलाकर उपन्यास पारंपरिक भारतीय दर्शन में वक्त या समय की जो महत्ता है उसे ही स्थापित करता है। तभी तो जिस विवान को इंगलैंड की सत्ता में भागीदारी करनी चाहिए थी वह यहां मय्यत कमेटी का दफ्तर चला रहा होता है। आम भारतीय भी अपनी रोजाना की बातचीत में जिस तरह दर्शन की अंध गुहा में आपको ले जा सकता है और आप वहां भटकते रह सकते हैं यह उपन्यास भी आपको उस भूल भुलैया के दर्शन कराता है अब आप पर है कि आप उससे निकलना चाहते हैं कि उसी में अपनी निष्पत्तियां तलशते फंस कर रह जाते हैं। उपन्यासकार की निष्पत्ति यही है कि - हर जीवन एक महागाथा है, एक द्युमान लोक है,एक परम सत्य है। ये जीवन जीवन ही पतझर की तरह चारों ओर बिखरे हैं।...इनकी व्यप्ति ही अंतरिक्ष है।इनकी गति ही अहर्निश है। इनकी निरंतरता ही महाकाल है। यही जीवन ऋतु हैं,बम्ह हैं,चराचर जगत का आधार हैं। रचनाकार की दिक्कत यह है कि वह पक्ष और विपक्ष दोनों का दर्शन रच देना चाहता है वह स्वयंभू बनना चाहता है आम पारंपरिक भारतीय रचनाकार की तरह और दर्शन की उलटबंसी बजाकर बहुत जगह बेजा परेशान भी कर देता है। यूं उपन्यास अपनी उपस्थिति दर्ज करता है रचना के खाली लगते मैदान में, अगर धैर्य हो तो इसे पढकर पाठक खुद को विचारवान महसूस करेगा।

बुधवार, 29 जून 2016

उमा – पिता की अदृश्‍य होती सत्‍ता

युवा उपन्‍यासकार उमा के ज्ञानपीठ से आए उपन्‍यास जन्‍नत जाविदां को गूगल देवता के प्रकोप के बाद के दौर के प्रतिनिधि लेखन के तौर पर रेखांकित किया जा सकता है। अंतरजाल में उलझते विश्‍व में हमारे संबंध किस तरह बदल रहे हैं कि मां बेटे के संवाद मित्र संवाद की तरह हो गए हैं, अत्‍याधुनिक। पर श्‍यामली और आर्य के मध्‍य के आधुनिक संवादों के बरकस हमारी दुनिया तो अभी भी वहीं है, सामाजिक स्‍तरों और तमाम खांचों में घूंघट के पीछे वह आज भी अपने देवता गढ रही है। पर मुक्ति की तलाश में पीडित स्‍त्री से देवता खिलानेवाली देवी के रूप में बदली तुलसी की मुक्ति कहां है। ऐसे बहुत से सवाल छोडता यह उपन्‍यास नयी पीढी के अंतरद्वंद्वों और सोच को उनकी कुंठाओं और नये विचारों के साथ सामने लाता है। करीब 200 पृष्टिों के छोटे आकार में यह उपन्‍यास समाज के जितने रंगों को उसके विभिन्‍न शेड्स के साथ उभारता है उसे उपन्‍यासकार की ताकत के रूप में देखा जा सकता है।
तलाकशुदा एकल मां श्‍यामली और उसके बेटे आर्य के जीवन संघर्ष को सामने रखती यह पुस्‍तक इसी संदर्भ में चर्चित उपन्‍यास ‘आपका बंटी’ की अगली कडी की तरह है। ‘आपका बंटी’ की आरंभ में चर्चा भी है उपन्‍यास में।पर श्‍यामली का आर्य ‘आपका बंटी’ नहीं है। एक पिता की कामना तो है उसमें पर वह उसके बंटी की तरह कमजोर नहीं बनाती, वह करूणा का पात्र नहीं है। क्‍योंकि श्‍यामली के धैर्य और विवेकने उसे आश्रित पुत्र की तरह नही एक सहयेागी मित्र की तरह विकसित किया है। पिता की कामना है आर्य को भी पर पिता को वह अपनी मां के मित्र के रूप में पाना चाहता है, उसके परमेश्‍वर के रूप में नहीं।
आर्य के लिए पिता कोई सत्‍ता नहीं है। वह स्‍कूल के अपने साथियेां के सवालों के जवाब के लिए पिता को खोजता है, कभी कभार पर वह उसके मानस के केन्‍द्र में नहीं है। वह पिता के रूप में मां के लिए नया साथी चाहता है और इस रूप में अपने लिए एक मित्र चाहता है।
नयी सभ्‍यता और विकास के नये दौर में पिता एक अदृश्‍य होती सत्‍ता की तरह है, इसका प्रमाण है आर्य का चरित्र। यह उपन्‍यास मातृसत्‍ता की वापसी का संकेत भी है। नयी सभ्‍यता की सहज परिणती भी है यह। इस सभ्‍यता में संतानें अब कामना की तरह नहीं रह गयी हैं। वे करियर और तमाम अन्‍य प्राथमिकताओं के बरक्‍स एक बाधा की तरह रह गयी हैं। और ऐसा घटित होने में पिता की भूमिका प्रमुखता से उभरती है। संतानों पर अपनी कामनाओं को तरजीह देना पिता के रूप्‍ में उसकी सत्‍ता से उसे बेदखल करता है।
चाहे आज पिता पिता नहीं रहा।पर संतानें तो हैं और उनके साथ उनकी माताएं हैं,मित्रवत माताएं। शासक पिता के मुकाबले मित्र माता के प्रति संतानों का खिंचाव सहज है और यह नयी सभ्‍यता को माता की नयी सत्‍ता सौंपता है। यह स्त्रियों को गुलाम बनाए रखने की हजारों सालों की उनकी कोशिशों का नतीजा है कि पिता के रूप में आज वे अदृश्‍य होने की परिणतियों की ओर बढ चुके हैं।
श्‍यामली सोचती है- ‘जिंदगी वाकई सडक की तरह ही तो है, जो चलती रहती है, कहीं पहुंचती नहीं। कोई मंजिल नहीं, मंजिल मिली तो सडक खत्‍म, जिंदगी खत्‍तम।‘ कल तक यह सोच पुरूषों की थी। विवाह स्त्रियों के लिए मंजिल की तरह था पर पुरूषों के लिए नहीं। आज स्त्रियां भी इसी तरह सोच पा रही हैं और मुक्‍त हो पा रही हैं।
यह मुक्ति उनकी भाषा में नये रंग भर रही है-‘हल्‍की दाढी, लम्‍बी–दुबली काया पर ढीला-ढाला कुर्ता और जींस , यह पूरी पैकेजिंग बताती है कि सुभाष का ताल्‍लुक कला की दुनिया से है। घर का हुलिया और खामोशी बयां करती है कि सुभाष के इस घर में खामोशियां गुनगुनाया करती हैं। अकेलेपन के इस मार्केट में मायूसी के ज्‍यादा शेयर्स सकून के पास हैं।‘ उपन्‍यासकार की यह शब्‍दावली अगर जीवन में बाजार के दखल को सामने लाती है तो साथ-साथ खामोशी, मायूसी और सकून को नये ढंग से परिभाषित भी करती है। पितृसत्‍ता की सतायी स्त्रियों के पास खोने को कुछ नहीं है। पित परमेश्‍वर से मुक्ति के बाद वे मायूस नहीं हैं। अकेलापन और खामोशी भी उसके लिए सुकून का वायस है, इसमें वे अपनी और अपने नये समाज की पुनर्रचना कर पा रही हैं।
उनके पास अपना अर्जित दर्शन है जो उनकी अपनी अदा के साथ बारहा प्रकट होता है। नौ साल का बेटा जब पूछता है कि – मम्‍मा जी ये आसमां नीला क्‍येां होता है तो श्‍यामली का जवाब होता है – ये पीला भी होता तो क्‍या तुम सवाल नहीं करते, इसे किसी न किसी रंग का तो होना ही होगा न। स्‍पष्‍ट है कि जो कुछ झेल कर आज की स्‍त्री बाहर आ रही है उसने रंगों के पारंपरिक मानी और अर्थों के प्रति उसमें एक विद्रोह भर दिया है जिसे वे अपनी तरह से हल करती हैं। जन्‍नत जाविदां की श्‍यामली विश्‍व की उस स्‍त्री का प्रतिनिधित्‍व करती है जिसने पुरूषों के बरक्‍स अपनी नयी दुनिया रची है। उसमें रंगों के वही अर्थ नहीं रहने हैं जो थे।
प्रेम में अक्‍सर लोग अपने साथी से कहते हैं कि मैं और तुम अलग हैं क्‍या। पर यह एकसा वाला दर्शन बस प्रेम में पुरूष ही बघारते हैं और प्रेम के अलावे इसका कहीं प्रयोग नहीं हेाता। जीवन के अन्‍य तमाम मसलों में यह छद्म एकसापन दूर तक साथ नहीं दे पाता। नये दौर की स्‍त्री अब इस भुलावे को भोली बनकर सह नहीं पा रही। उपन्‍यास में माही एक जगह कहती है – एक होते तो एक मुंह से खाते...। स्त्रियां आज समझ चुकी हैं कि अब ‘प्रेम फुरसती लोगों का सब्‍जेक्‍ट है। पीत्‍जा संस्‍कृति का हिस्‍सा है।...प्रेम पैसे बहुत दिलाता है।‘ हमारे आपके जीवन में प्रेम नहीं है तभी लोग ‘दो सौ रूपये खर्च कर उसे देखने’ मॉल-हॉल जाते हैं।‘
उपन्‍यास में श्‍यामली का बेटा आर्य का चरित्र अनोखा लगता है। आज के बच्‍चे कितना बदल चुके हैं। आर्य जब बोलता है तो लगता है जैसे बाप-बेटा एक साथ बोल रहे हों। एकल मां का यह बेटा पति के ना होने पर मां के दोस्‍त की भी भूमिका अदा करता दिख रहा है। श्‍यामली आर्य को चालू मोबाइल टोन के लिए डांट रही होती है, फोन आने पर, तो आर्य बोलता है – ‘मम्‍मा पहले कॉल अटेंड कर लो, फिर डांट लेना बच्‍चे को’।
उमा यह उपन्‍यास स्‍त्री विमर्श से आगे मनुष्‍यता के विमर्श को छूता सा लगता है। पुरूष लेखक जिस तरह अपनी कुंठाओं और टैबू को खुलकर अभिव्‍यक्‍त करते हें, उमा ने भी इस मामले में कोई हिचक नहीं दिखाई है। पढते हुए आदमी चौंकता है पर अगर पुरूष लेखन में उसे बहादुरी की तरह लिया जाता है तो यहां उसके कुछ और मानी क्‍येां निकाला जाना चाहिए। ‘हरामी होता है आदमी ... तब अपना हरामीपन जाग जाता है’।
परंपरिक उपन्‍यासकारों की तरह उमा ने भी उपन्‍यास में समाज सुधारके कुछ प्रसंग साथ-साथ चलाए हैं। इस दौर में यह लेखिका की समाज के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
उपन्‍यासों और कहानियों में कवितांश कोट करना लेखकों के यहां सहज होता है, वह पाठ को रोचक बनाता है। उमा ने भी कई अध्‍यायों की समाप्ति कवितांश से की है, पर वे पंक्तियां लेखिका की खुद की हैं और कहीं कहीं वो छूती भी हैं।
बेटे की यौन जिज्ञासाओं का जवाब देते जिस तरह श्‍यामली एड्स का डर दिखा उसे चुप कराने की कोशिश करती है उसे पारंपरिक पितृसत्‍तात्‍मक तरीके की कुंठाएं पैदा करने वाले भय पैदा करने की कोशिशों की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।
एड्स के उदाहरण के रूप में मां-बेटे जिस तरह फिल्‍मों का उदाहरण देते हैं एक दूसरे केा वह एक बडी सामाजिक समस्‍या की ओर ईशारा करता है। श्‍यामली सोचती है- -‘हर बात फिल्‍मों के जरिए ही क्‍येां समझानी पडती है, क्‍येां हमारे पास कोई और उदाहरण नहीं होते’। यह एक बडा सवाल है जो हमारे समाज के नकलीपन को दर्शाता है।
स्त्रियों के भीतर जो सुंदर दिखने की कंडिशनिंग होती है, उस पर भी विचार किया है लेखिका ने। सारे पार्लर यूं ही नहीं चलते, करोडों का क्रीम का कारोबार यूं ही नहीं है’। यह एक गंभीर सवाल है कि –सारे दुखों के बीच भी जैसे यह कितना जरूरी होता है कि आप भीड से अलग नजर आओ। सुंदर नजर आओ।