कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Monday, 5 June 2017

प्रियंबद - छुटटी के दिन का कोरस


'छुटटी के दिन का कोरस' विन्सेंट डगलस यानि विवान के 1947 की ऐतिहासिक तारीख के दोनों ओर फैले जीवन की बिखरी स्मृतियों का कोलाज है। इस कोलाज में इतिहास और यथार्थ, स्वप्न और जीवन, कल्पना और वास्तविकता एक दूसरे पर ओवरलैपिंग करते नजर आते हैं और इस सब से उपजा दर्शन इस कोलाज को जोडे रखता है। इस कोलाज में बैठा विवान सोचता है कि अक्सर हम ऐसी प्रतीक्षाएं करते हैं जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे कभी नहीं मिलतीं। विवान के लिए स्मृतियां ही यथार्थ हैं क्योंकि वे निष्कवच हैं। कि जो पवित्र दिखता है उसका षडयंत्र अपवित्र अंधेरी घाटियों में चलता रहता है। विवान के बहाने उपन्यासकार जैसे शंकर के मायावाद को फिर फिर रचना चाहता है पर उस माया को विच्छिन्न करने वाले सूत्रों को सामने आने से वह रोक नहीं पाता। हम सभी जानते हैं कि सच झूठ,पवित्र अपवित्र अगर संदर्भ रहित हों तो मात्र जुमले हैं, कि स्मृति का यथार्थ स्मृति का यथार्थ होता है जीवन के यथार्थ को वह धूमिल नहीं कर सकता।
इस उपन्यास में विवान के बहाने जितने बडे कालखंड को उपन्यासकार रचना चाहता है वह उसके अध्ययन और आत्मविश्वास से ही संभव हो पाता है अब वहां कहंा तक रच पाता है इसे भी वह जानता है इसलिए उसे कोरस ही कह पाता है और वह भी छुटटी के दिन का। इस कोरस की लय जहां तहां टूटती है पर हर बार उपन्यासकार उसे संभाल लेता है। विवान के बिखरे जीवन में जितने रंग हैं उतने एक साथ किसी एक उपन्यास में लाना उपन्यासकार की सफलता है। ये विवरण जीवन के फैले बहुआयामी यथार्थ से हमारा परिचय कराते हैं भले वे किसी निष्कर्ष तक ना पहुंचाते हों। आखिर यह मन और स्मृति की एक दिन की उडान ही तो है। इस लिहाज से यह एक दिन आत्मविश्लेषण का निर्णायक दिन है और इस एक दिन में विवान अपने जीवन और इतिहास का विश्लेषण कर जाता है।
उपन्यास में आए अनेक पात्रों के मनोजगत में लेखक गहरे उतरता है और नये नये रहस्य उजागर करता है और एक जगह तो वह अपने मुख्य पात्र के मनो जगत की छानबीन की भी नाटकीय कोशिश करता है जो अंततः एक तमाशे से ज्यादा प्रभाव नहीं छोड पाता। उपन्यास में गालिब जहां तहां शिरकत करते हैं और उपन्यास को एक लय प्रदान कर जाते हैं। आम भारतीय मानस की अच्छी पडताल है उपन्यास में अब वह परंपरिक परिवारों के भीतर चल रही प्रेम पच्चीसियां हों या आम हिस्टिरियाक चरित्रों का चित्रण। हां उपन्यास में जिस तरह हर पडाव पर एक यौन दृश्य को रचा गया है वह उसके ऐतिहासिक चरित्र को बाधित करता है।
कुल मिलाकर उपन्यास पारंपरिक भारतीय दर्शन में वक्त या समय की जो महत्ता है उसे ही स्थापित करता है। तभी तो जिस विवान को इंगलैंड की सत्ता में भागीदारी करनी चाहिए थी वह यहां मय्यत कमेटी का दफ्तर चला रहा होता है। आम भारतीय भी अपनी रोजाना की बातचीत में जिस तरह दर्शन की अंध गुहा में आपको ले जा सकता है और आप वहां भटकते रह सकते हैं यह उपन्यास भी आपको उस भूल भुलैया के दर्शन कराता है अब आप पर है कि आप उससे निकलना चाहते हैं कि उसी में अपनी निष्पत्तियां तलशते फंस कर रह जाते हैं। उपन्यासकार की निष्पत्ति यही है कि - हर जीवन एक महागाथा है, एक द्युमान लोक है,एक परम सत्य है। ये जीवन जीवन ही पतझर की तरह चारों ओर बिखरे हैं।...इनकी व्यप्ति ही अंतरिक्ष है।इनकी गति ही अहर्निश है। इनकी निरंतरता ही महाकाल है। यही जीवन ऋतु हैं,बम्ह हैं,चराचर जगत का आधार हैं। रचनाकार की दिक्कत यह है कि वह पक्ष और विपक्ष दोनों का दर्शन रच देना चाहता है वह स्वयंभू बनना चाहता है आम पारंपरिक भारतीय रचनाकार की तरह और दर्शन की उलटबंसी बजाकर बहुत जगह बेजा परेशान भी कर देता है। यूं उपन्यास अपनी उपस्थिति दर्ज करता है रचना के खाली लगते मैदान में, अगर धैर्य हो तो इसे पढकर पाठक खुद को विचारवान महसूस करेगा।

Sunday, 29 January 2017

कुमार अंबुज - 'मौलिकता एक मिथ है'


'थलचर' कवि कुमार अंबुज की डायरीनुमा टिप्‍पणियों व पत्रांशों का राधाकृष्‍ण प्रकाशन से आया संकलन है। इनमें कवि का एक आत्‍मीय चिंतक रूप उभर कर सामने आता है। इनसे गुजरते हुए कहीं-कहीं रिल्‍के के पत्रों की याद आती है। नेहरू ने कहा था 'आराम हराम है'। पर फिल्मकार लुई बुनुएल 'आराम हराम है' का मजाक उड़ाते थे। एक पत्रांश में अंबुज भी अवकाश की सार्थकता पर बात करते हैं, कि अवकाश खासकर रचनाकारों के लिए कितना अहम है - ' ...अपने अवकाश की खोज लगातार करना चाहिए जिसमें तुम अपने निजी होने को , मनुष्‍य होने को , आलस्‍य और उनींदेपन को अनुभव करते रह सको, जिसमें तुम इंद्रियों को ढीला छोड़ सको और उन्‍हे छूट दे सको कि वे अपना काम अपनी तरह से करती रह सकें...'
पुस्‍तक के कई हिस्‍से आध्‍यात्‍म‍िकता और दार्शनिकता का पुट लिए हुए हैं। चकाचौंध से भरी इस दुनिया में अंबुज तारों भरी रात की बातें करते हैं -'...वे आंखें नहीं रहीं जो तारों की रोशनी में भी अपने आसपास को देख लेती थीं और वे रास्‍ते भी नहीं रहे जो तारों की रोशनी से किसी चमकदार धातु की तरह व्‍यवहार कर सकते थे।' यह तथाकथित विकास किस तरह हमसे प्राकृतिक जीवन के तमाम रंगों को छीनता जा रहा, यह ये पंक्तियां जाहिर करती हैं।
1998 की अपनी डायरी में अंबुज जनसंख्‍या और राजनीति को लेकर विचार करते हैं कि बढती जनसंख्‍या और मशीनें कैसे एक दूसरे के विरूद्ध खड़ी हो जा रही हैं और राजनीति की इससे निपटने में कोई रूचि नहीं है। यहां वे गांधी और मार्क्‍स को याद करते हैं कि ये तमाम लोग अपने अपने तरह से यह बात कहते हैं कि मशीनों की जगह बड़ी आबादी का साधन की तरह उपयोग हो तभी हम आगे की राह निकाल सकते हैं।
अंबुज एक रचनाकार के लिए दुनियादारी से यथासंभव बचे रहने को रचनात्‍मक मानते हैं। वे सोचते हैं कि एक रचनाकार के लिए 'दुनियादारी से अधिक नुकसानदेह कुछ नहीं हो सकता।'
रचना में मौलिकता के बेजा आग्रह को अंबुज सही नहीं मानते। वे मौलिकता को एक मिथ मानते हैं। विश्‍व कवि नेरूदा भी मौलिकता की अवधारणा से अपनी असहमति जताते हैं। अंबुज लिखते हैं -' जिस तरह एक मौलिक मनुष्‍य असंभव है उसी तरह एक मौलिक रचना नामुमकिन है। मौलिकता एक अवस्थिति भर है।' अंबुज मानते हैं कि रचनाकार परंपरा से चली आ रही चीजों-स्थितियों को बस एक नये तरह से संयोजित कर सकता है। यही मौलिकता है। अवयव मौलिक नहीं हो सकते। 'मौलिकता जड़-चेतन से सापेक्ष है, निरपेक्ष नहीं।'
उम्र और रचनात्‍मकता पर अंबुज की राय रोचक है। वे बड़े रचनाकारों के जीवन का हिसाब लगाते पाते हैं कि अधिकांश रचनाकार अपना उत्‍कृष्‍ट लेखन चालीस की उम्र के पहले कर चुके होते हैं। चालीस के बाद अच्‍छा लेखन संभव नहीं। इसके बाद लिखते जाने का कोई अर्थ नहीं। यहां अंबुज एक औसत हिसाब करते दिखते हैं। उम्र का रचनात्‍मकता से रिश्‍ता इतना सरल नहीं है। गांधी को याद कीजिए। चालीस के बाद ही उनका उत्‍कृष्‍ट रचनात्‍मक जीवन सामने आता है।
कुल मिलाकर पुस्‍तक में विविध विषयों पर आत्‍मीय ढंग से बातों को रखा गया है जो पाठकों को एक आध्‍यात्मिक-दार्शनिक भावभूमि पर ले जाता है।


Saturday, 14 January 2017

हिंदुस्तानी समाज और आलोचना की संस्कृति

 हिंदुस्तानी समाज में आलोचना की दो तरह की संस्कृति है,एक वह जो दमन के प्रतिकार में आरंभ होती है, दूसरी वो जो अपने समय व समाज के प्रति असंतोष के फलस्वरूप विकसित होती है। अपने संत कवियों में हम इन दो संस्कृतियों का आधार देख सकते हैं।मांग के खइबो मसीत के सोइबो,लेबे के एक न देबे के दोउ लिखने वाले तुलसीदास की पीडा आत्मदमन से उपजी है। आज के मानदंडों पर तुलसी एक दलित साहित्यकार साबित होते हैं। जन्म से जातिनिकाला पाए अछूत के घर पले बढे,तुलसीदास का साहित्य,जाति परंपरा में अपनी जगह तलाशते एक दलित मन की गाथा है। इसीलिए वह स्वांत:सुखाय है, क्योंकि उस संस्कृतनिष्ठ ब्राह्मणवादी परंपरा में उनके द्वारा अवधी जैसी लोकभाषा में लिखी गयी कृति को कौन महत्व देता।
इसके विपरीत ब्राह्मण ते गदहा भला,आन देव ते कुत्ता,मुल्ला ते मुरगा भला,नगर जगावे सुत्ता लिखने वाले कबीरदास की लडाई समाज के कई स्तरों पर है। वह ब्राह्मणवादी परंपरा में अपनी जगह बनाने की लडाई मात्र नहीं है। कबीर स्वांत: नहीं सर्वांत:सुखाय लिखते हैं। वे तुलसीदास की तरह अपना कोई मर्यादापुरूषोत्तम नायक नहीं रचते। दशरथ पुत्र राम की जगह वे प्रकृतिस्वरूप राम को अपना आदर्श बनाते हैं। उनका राम घट घट वासी है अयोध्यावासी नहीं।
कबीर की लडाई परमपद पाने की नहीं है। वे विश्वामित्र की तरह वशिष्ठ के मुख से अपने लिए मात्र ब्रह्मर्षि शब्द सुनने के लिए विद्रोह नहीं करते।तहलका मचा रही तत्कालीन भाजपा सरकार के समय ही दलित साहित्य का जो आंदोलन हिंदी पट्टी में जोर मार रहा था वह यूं ही नहीं था। इसके विपरीत उसी समय पान दुकानों से लेकर विभिन्न पूजा पाठ आदि अवसरों पर भी कबीर के कैसेटों का बजना अलग मर्म रखता है। दरअसल ये दो संस्कृतियां हैं , जो कभी टकराती हुयी समानांतर चलती हैं कभी पूरक बनती हैं। आजादी की लडाई के दौरान भी ये धाराएं अपने ढंग से सक्रिय थीं। गांधी के राम भी दशरथ के राम नहीं थे। ऐसा गांधी खुद लिखते हैं, उनकी मां कबीर पंथी थीं। वहीं दूसरी जमात रामरचिराखा वाली थी। जो खुद को उस दौर में किनारे रखे रही, वह सोचती रही कि अंग्रेज यहां हैं तो रामजी की कोई मंशा होगी। पहली धारा में एक तरह का प्रतिक्रियावाद होता है जो एक स्वांत: सुखाय नायक रचता है। उसकी मर्यादा रचता है और इसतरह उन्हें पतित माननेवाले ब्राह्मणों के त्रिदेवों के वरक्स अपने पतितपावन देवता रचता है। वह एक व्यक्तिगत जेहाद रचता है पर जहां से उसके नायक की मर्यादा को कथा में आघात लगनेाला होता है वहां वह कथा स्थगित कर देता है। क्योंकि आगे वाल्मीकि की तरह अगर वह लव-कुश प्रसंग में जाता तो उसे लिखना पडता - राम रथी विरथी लवकूशा...देखहीं सीता भयउ कलेशा...। पर ऐसा करने पर राम नायक नहीं बन पाते। और ऐसा कर तुलसी एक और शास्त्र नहीं रच पाते। वाल्मीकि कबीर की ही धारा के अग्रज कवि हैं। उनकी रचनात्मकता सत्ता को चुनौती दे डालती है। वे राम की मर्यादा को लवकुश द्वारा धूल धूसरित करवा देते हैं और राम को सरयू में डूब मरना पडता है। दलित होने के बाद भी वाल्मीकि दलित साहित्यकार नहीं हैं क्योंकि वे दमन के प्रतिरोध में डाकू बन जाना पसंद करते हैं।
वाल्मीकि और कबीर की तुलना में तुलसी की धारा थोडी चुप्पा किस्म की है। उनके स्वांत: सुखाय में भी समाज की आलोचना है, पर वह थोडी सीमित है। क्योंकि ऐसे समय में जब दरबारी साहित्य का बोलबाला था। राजा के स्तुतिगान में ना लगकर स्वांत: सुखाय लिखना भी आलोचना की एक तकनीक ही थी। पर इसके पीछे सत्ता मात्र की आलोचना नहीं थीं। बल्कि वहां सत्ता पर अपने राजाराम को स्थापित करने की आकांक्षा थी। जबकि कबीर किसी भी सत्ता के खिलाफ थे। रहीम तुलसी के ही मित्र थे। वे पारंपरिक रूप में दरबारी नहीं थे। क्योंकि वे सेनापति भी थे अकबर के। पर उनकी व्यथा भी तुलसी के समान थी, इसलिए वे निजमन की व्यथा मन में ही रखने की बात करते हैं। यह व्यथा को मन में रखना और तुलसी का स्वांत: सुखाय दोनों एक ही हैं। मन की व्यथा जब रचना में परिणत होती है, तो अंत:करण को सुख देती है। जबकि कबीर की व्यथा केवल मन की नहीं है, व्यापक जनजीवन की है। वेदांत या उपनिषद में हम पहली धारा की शास्त्रीयता के विरूद्ध संघर्षों की अभिव्यक्ति पाते हैं। साधना पहली धारा का मुख्य हथियार है। वह वेट एंड सी का ही शास्त्रीय रूप है। अवसर की अनुकूलता आने तक धैर्य रखना ही साधना है जबकि दूसरी धारा का हथियार बहुआयामी संघर्ष है। मात्र अलख जगाए रखने से काम नहीं चलता। यह दूसरी धारा थोडी निर्मम और उत्साही भी है।
हिन्दी साहित्य की आलोचना में रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा पहली धारा का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं। जबकि हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह दूसरी धारा का । यह दूसरी धारा विवाद यानी एंटी थीसिस की रचना करती है। जबकि पहली धारा वाद से संवाद के मध्य धैर्य पूर्वक अलख जगाये रखती है। ये दोनों ही धाराएं पूरक सी हैं।एक धारा परिवर्तन में रूचि लेती है, तो दूसरी मूल्यांकन में। दूसरी धारा रूढियों में परिणत हो चुके अपने घर को जलाने से भी नहीं हिचकती - जो घर जारे आपना चले हमारे साथ ...। वह दो सिरों से जलने वाली मोमबत्ती की तरह सबसे अंधेरे काल को प्रकाशित करने की कोशिश करती है। दूसरी धारा संक्रमण काल की निर्णयक शक्ति होती है। एक ही आदमी में दोनों धाराएं साथ साथ हो सकती हैं। व्यक्ति में जो धारा मुखर होती है,उसी से उसकी पहचान होती है। गांधी में जैसे दोनों ही धाराओं का संतुलन था। रामविलास शर्मा ने भी जो निराला की जीवनी आधारित साहित्य साधना की रचना की है, उसमें दूसरी धारा पर जोर है। निराला दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि पंत-प्रसाद-महादेवी पहली धारा का। मीरा पहली धारा से हैं जबकि मारीना तस्वेतायेवा और तसलीमा नसरीन दूसरी धारा से। दूसरी धारा की स्त्री रचनाकारों का अभी हिंदी समाज में प्रकाट्य नहीं हुआ है। यूं कात्यायनी, निर्मला पुतुल को हम दूसरी धारा से जोडकर देख सकते हैं। स्वांत: सुखाय वाली तुलसी की धारा नामवर सिंह के मंच लूटनेवाले वक्तव्यों में भी दिखती है। इसे वे मेरी हिम्मत देखिए, मेरी तबीयत देखिए, सुलझे हुए मसलों को फिर से उलझाता हूं मैं ... कहकर परिभाषित भी करते हैं। जबकि नामवर सिंह के ही पिछले लेखन का काल दूसरी धारा का परिचायक है। जिसे याद कर कभी शमशेर ने अकबर इलाहाबादी का शेर उद्धृत करते हुए नामवर सिंह के बारे में कहा था - हमारी बातें ही बातें हैं, सैयद काम करता था ... न भूलो फर्क जो है, कहने वाले करनेवाले में ...।

Monday, 26 December 2016

एक बादशाह की प्रेम कहानी - कुमार मुकुल

'बाजबहादुर-रूपमती' दिशा प्रकाशन दिल्‍ली से प्रकाशित लक्ष्‍मीदत्‍त शर्मा 'अन्‍जान' की रोचक ऐतिहासिक कृति है। अन्‍जान की यह इकलौती कृति उनके मरणोपरांत ही प्रकाशित हो सकी। इस विषय पर हरेकृष्‍ण देवसरे का भी 'मालवा सुलतान' नाम से उपन्‍यास है। यह उपन्‍यास शेरशाह से लेकर हुमायूं और अकबर तक के शासन काल की झलकियां दिखाता चलता है। एक अफगान शासक बाजबहादुर और एक सामान्‍य हिंदू संगीतज्ञ की बेटी रूपमती की यह प्रेमकहानी राजवंशों की प्रेम कहानियों के मुकाबले ज्‍यादा मानवीयता लिए हुए है।
कभी माण्‍डव का शासक रहा बाजबहादुर जंगलों में छुपकर मुगलों से जान बचाता फिरता है। आखिर वह जंगली जातियों और भील सरदारों की सहायता लेकर मुगलों से फिर मुकाबला करता है और अपना राज्‍य वापिस लेता है। पर जब उसे मालूम होता है कि अकबर के एक सरदार की प्रताड़ना का शिकार होकर रूपमती ने जहर खाकर अपनी जान दे दी है तो फिर राज-काज चलाने की उसकी इच्‍छा नहीं रहती।
फिर उसे पता चलता है कि रूपमती को मौत की आगोश में जाने को मजबूर करने वाले मुगल सरदार अदहम खां , जो अकबर का कोका भाई भी था, को इस क्रूरता के एवज में अकबर के हाथों मरना पड़ा तो उसका अकबर के प्रति नजरिया बदलता है। अकबर हिंदू प्रजा का भी उसी तरह ख्‍याल रखता था जैसा मुस्लिम प्रजा का रखता था। उसने रूपमती के ताबूत को उसके मादरेवतन सारंगपुर में वापिस भिजवा कर सम्‍मान के साथ दफनवाया था और उसकी कब्र पर एक खूबसूरत मजार भी बनवाई थी। यह सब जानकर बाजबहादुर का मन अकबर के प्रति बदलता चला गया। उसे बस एक दुख था कि अनजाने में अकबर से एक गलती हो गयी थी। उसने रूपमती को वादा किया था कि वह उसके धर्म का भी अपने धर्म की तरह सम्‍मान करेगा। और अगर जीते जी उसका इंतकाल हुआ तो उसे दफनाने की बजाय चिता को अर्पित करेगा। पर राज-काज के लफड़े में वह अपनी रूपमती को मरते समय देख भी न सका।
दरअसल बाजबहादुर अफगान शासक के साथ एक पहुंचा हुआ गायक भी था। रूपमती पहली मुलाकात में उसके गायक रूप पर ही रीझ गयी थी। फिर उनका प्रेम परवान चढा पर शासक पिता के दबाव में विवश बाजबहादुर को एक सरदार की लड़की से विवाह करना पड़ा पर इससे उसका प्रेम मरा नहीं। उधर रूपमती भी मन से बाजबहादुर को निकाल ना सकी। आखिर पिता की मृत्‍यु के बाद बाजबाहदुर ने रूपमती को अपनाया। इससे नाराज होकर सरदार की पुत्री ने राजमहल छोड मायके का रूख किया और फिर रूपमती के जीते जी वापिस नहीं आयी। हालांकि रूपमती ने कभी रानी बनने की इच्‍छा नहीं जतायी और बाजबहादुर के साथ संगीत की महफिलों में ही रमी रहीं।
यह उपन्‍यास दर्शाता है कि अगर बाजबहादुर इस संगीत प्रेम में ना पड़ता तो संभव था कि भारत का इतिहास कुछ और होता। क्‍येांकि बाजबहादुर लड़ाका भी जबरदस्‍त था। अपनी जिंदगी में उसने कभी किसी से हार नहीं मानी। संगीत के साज के साथ उसने सत्‍ता भी साध ली थी। पर संगीत की म‍हफिलें और बर्बरता आधारित राजसत्‍ताएं साथ-साथ कैसे चलतीं। तो मुगल धीरे-धीरे काबिज होते गए।
हालांकि बाजबहादुर ने भीलों की सहायता से मुगलों से माण्‍डव की सत्‍ता फिर छीन ली थी पर रूपमती की मौत की खबर ने उसके मानस को बदल दिया। उसने सोचा कि शासक तो अकबर भी अच्‍छा ही है। सो अंत में जीती बाजी हारते हुए उसने अकबर के दरबार में एक गायक के रूप में रहने को एक शासक के रूप में रहने पर तरजीह दी।
कहा जा सकता है कि प्रेम और संगीत के सामने बाजबहादुर ने तख्‍तो-ताज को किनारे कर दिया। उसके काल के तमाम शासकों को लोग बिसार चुके हैं तभी तो रूपमती और बाजबहादुर की कथा को लोग अपने-अपनी तरह से लिख रहे हैं।
पुस्‍तक – बाजबहादुर-रूपमती
लेखक - लक्ष्‍मीदत्‍त शर्मा 'अन्‍जान'
प्रकाशक - दिशा प्रकाशन, दिल्‍ली।

Thursday, 22 December 2016

फैज - अंधेरे में सुर्ख लौ

‘फैज की शख्सियत:अंधेरे में सुर्ख लौ’ मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान,कांतिमोहन सोज आदि के संपादन में राजकमल प्रकाशन से आयी एक अच्‍छी किताब है, जिससे गुजर कर फैज्‍ के बहुआयामी व्‍यक्त्त्वि को जानने समझ में काफी मदद मिलती है। पुस्‍तक में खुद फैज अहमद फैज की आपबीती की दो‍ किस्‍तों के अलावे उनकी पत्‍नी एलिस फैज और जेल में साथ समय बिताने वाले व अन्‍य मित्रों के संस्‍मरण हैं।
आपबीती को पढकर यह जाहिर होता है कि फैज का जीवन सहज नहीं था। उन्‍होंने जिंदगी में काफी उठा-पटक देखी थी। उनके पिता उन्‍हें बताया करते थे कि बचपन में वे चरवाहे थे फिर आगे वे जिंदगी की चढान चढते गए और कैंब्रिज में पढाई आदि की और अंग्रेजों के वफादार हो गये थे और शान की जिंदगी बितायी थी। पिता को याद करते फैज एक जगह लिखते हैं कि उनका नाम सुल्‍तान था और मैं यह कह सकता हूं कि मेरे पिता राजा थे। पर विडंबना यह रही कि मरते समय तक उनके पिता ने अपनी सारी संपत्ति मौज-मस्‍ती में गंवा दी थी और विरासत में फैज के लिए संघर्ष छोड गये थे। फैज लिखते हैं कि जब पिता गुजरे तो घर में खाने तक को कुछ नहीं था।
1941 द्वितीय विश्‍वयुद्ध के समय उनका पहला कविता संकलन आया था जो खूब बिका था। पर युद्ध के बढने पर फैज ने फौज ज्‍वायन कर लिया। उस समय तक उनमें वामपंथी रूझान पैदा हो चुकी थी और उन पर फौज में शक किया जाता था। युद्ध की समाप्ति पर उन्‍होंने खुद फौज से अलग कर लिया। आगे 1947 में वे पाकिस्‍तान टाइम्‍स के संपादक हुए और चार साल संपादकी की। इसी समय अपने एक फौजी मित्र जनरल अकबर खान के साथ मिलकर सरकार पलटने के षडयंत्र में उन्‍हें जेल हुयी। जेल में पढने-लिखने का काफी वक्‍त होने के चलते उनकी कलम वहां लगातार चलती रही।
यह सब पढते जाहिर होता है कि फैज में जिंदगी को जीने का दुर्निवार जज्‍बा था जो जेल के कमरों को भी अध्‍ययन कक्ष में बदल देता था। ऐसी मिसालें हमारे यहां पं. नेहरू, गांधी आदि ने भी दी हैं जिन्‍होंने जेल में रह कर काफी कुछ पढा लिखा।
अपनी शरीफाना बनावट का श्रेय फैज महिलाओं को देते हैं जिनकी सोहबत में वे आम उज्‍जडपन से बचे रहे। फैज के पारिवारिक मित्र आफताब अहमद लिखते हैं – वो किसी से कोई कडवी या सख्‍त बात नहीं करते थे। शायद इसीलिए जीवन की कठिनइयों को वे अपने ढंग से झेल सके। जब उन्‍हें सरकार पलटने के इलजाम में जेल हुयी तो कुछ अखबारों ने उन्‍हें लेकर गद्दार विशेषांक तक निकाला। उस समय फैज ने लिखा –
जो हम पे गुजरी सो गुजरी, मगर शबे हिज्रां
हमारे अश्‍क तेरी आकबत संवार चले।
फैज की नाजुकमिजाजी की बाबत उनके साथ जेल में चार साल गुजार चुके साथी मेजर मुहम्‍मद इश्‍हाक लिखते हैं - ...यूं ही किसी ने त्‍योरी चढा रखी हो, उनकी तबीयत जरूरत खराब हो जाती है, और इसके साथ ही शायरी की कैफियत काफूर हो जाती है।
किताब फैज से जुडे कई निजी प्रसंग को सामने लाती है, जैसे कि वे छिपकलियों से बहुत घिनाते थे और आस पास दिख जाने पर बिछावन पर सो नहीं पाते थे। पाकिस्‍तान के फौजी शासन के समय जब वहां तमाम हिंदुस्‍ताने से जुडे रचनाकारों को पढने पर पाबंदी लगा दी गयी थी और रेडियो से बस इकबाल की रचनाओं का प्रसारण होता था तब फैज हिंदुस्‍तान रेडियों से अमीर खुसरो, फैयाज खां आदि को सुना करते थे।
पुस्‍तक के दूसरे खंड में फैज की खतो-किताबत और बातचीत को सं‍कलित किया गया है। जिसमें नूर जहीर और जहूर सिद्दीकी ने फैज और एलिस के खतों को सामने रखा है। इसके अलावे इब्‍बार रब्‍बी , नईम अहमद आदि से फैज की बातचीत भी इसमें शामिल है। कुल मिलाकर यह पुस्‍तक फैज को समझने में काफी हद तक मददगार साबित होती है।
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पुस्‍तक – फैज की शख्सियत: अंधेरे में सुर्ख लौ
संपादन – मुरली मनोहर प्रसाद सिंह,चंचल चौहान,कांतिमोहन सोज
प्रकाशक – राजकमल