कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

रविवार, 24 अप्रैल 2016

हृषिकेश सुलभ की कहानियां, विजयकांत और आंचलिकता

कुछ कहानियां सन्‍नाटे को भंग करती हैं पर हृषिकेश सुलभ की कहानियां सन्‍नाटे को चुपचाप ग्रस लेती हैं। इनमें जीवन के मद्धिम राग का जिस तरह प्रसार होता है वह संतोष देता है। सुलभ की कहानियों का बडा गुण यही है कि आलोचना इसकी बा‍बत बहुत कम बता सकती है। पढ कर ही इन्‍हे जाना जा सकता है।
इन कहानियों से गुजरना कुछ कुछ अपने आपको अपने समाज की अंतर्रचना के और दोनों के अंतरविरोध से उपजे परिवर्तनों को जानने और उससे आगे जाकर समझने की दृष्टि देता है। ये पुनर्रचना का उदाहरण हैं। जो एक कहानी पढने की खुशी से आगे जाकर कहानी बनने की प्रेरणा भी देती है।
ये कहानियां महानगरीय बोध से बाहर के जीवन में हो रहे परिवर्तनों की कहानी कहती हैं। स्‍त्री की प्रताडना हमारे समाज की विडंबनाओं में एक है। ‘कथावाचक की बेटी’ कहानी स्‍त्री की प्रताडनासे लेकर उसकी मुक्ति के संघर्ष तक की गाथा को बडे नाटकीय ढंग से प्रस्‍तुत करती है। इस कहानी का मूल उसकी भाषा है। भाषा को हटा देने पर कहानी में कुछ खोजना व्‍यर्थ होगा। यह कहानी ग्रामीण जीवन की कुरूपताओं को भाषा के स्‍तर पर सामने लाती है। वह एक ईमानदार कथावाचक की बेटी है। उसका बाप जिंदगी भर ईमानदारी से कथा बांचता है। बेटी ईमानदारी से कथा सुनती है और मुक्‍त होती है। पर उसका तोतारटंती समाज इससे प्रभावित नहीं होता। उसके लिए कथा उसकी उब मिटाने का एक साधन भर है। कहानी बतलाती है कि हमारे समाज में जो विभिन्‍न रीति-रिवाजों के फूल खिले थे, वे कब के मुरझा चुके हैं,अब कांटे ही शेष हैं। जिन्‍हें हम ढो रहे हैं।
जिंदगी भर फूलों की कथा सुनने वाली कथावाचक की बेटी जब ससुराल जाती है तो वहां भी फूल खोजती है पर उसका दामन कांटों से भर जाता है। वह पाती है कि वे फूल उसके तथाकथित सभ्‍य समाज के बाहर के असभ्‍य समाजों के जंगल में खिले रहे हैं। वह वहीं चली जाती है। पर क्‍या वह कथा के बाहर चली जाती है। नहीं, शायद यही कथा का विस्‍तार है, जीवन का विस्‍तार है।
भोजपुरी अंचल की भाषा सुलभ की कहानियों को अपने समय संदर्भों पर सहज पकड देती है। आज हिंदी में अधिकांशतया महानगरीय बोध की कहानियां लिखी जा रही हैं। ऐसे में सुलभ के यहां जैसे रेणु के बाद आंचलिकता अपनी सहज संप्रेषणीयता के साथ पहली बार सामने आती दिखती है।
यूं विजयकांत भी आंचलिकता से अपनी कहानियों को सशक्‍त बनाते हैं पर उनके यहां मिथिलांचल, जिस क्षेत्र की वे कहानियां हैं, की लोकभाषा पर उर्दू जैसे बेजा सवार मिलती है। इससे उन्‍हें एक शिल्‍पकाप की हैसियत तो मिलती है, एक गढाव और चुस्‍ती भी है इस अदाकारी में , पर वहां शैलियों का सामंजस्‍य गायब हो जाता है। वहां जीवन की द्वंद्वात्‍मक गति पर निर्णयात्‍मकता हावी सी हो जाती है। विजयकांत जहां शिल्‍प के स्‍तर पर दृढता का परिचय देते हैं, वहीं संप्रेषणीयता पैदा होता लगता है। उनके यहां यथार्थ कवच की तरह काम करता है। पर सुलभ सारा फैसला खुद ही नहीं कर लेते, वे पाठकों को भी निर्णय में भागीदार बनने का अवसर देते हैं। सुलभ के यहां एक उभरते चरित्र की जगह चरित्रों का समुच्‍चय है। एक पूरा टूटता व बनता हुआ समाज इन कहानियों के माध्‍यम आकार लेता दिखता है।
विजयकांत के यहां डायलाग्‍स की भरमार है, जिन्‍हे आप आसानी से कोट कर सकते हैं, उसका अभाव है सुलभ के यहां। आपको सुलभ की पूरी कहानी ही कोट करनी होगी। यह सुलभ के रचना और समाज के प्रति लगाव को दर्शाता है। सुलभ की अधिकांश कहानियां औपन्‍यासिक विस्‍तारों को खुद में समेटे चलती हैं।
सुलभ का अंचल रेणु के समय का अंचल नहीं है। उसमें नागरी संस्‍कृतिका हस्‍तक्षेप बढता जा रहा है। इस हस्‍तक्षेप के अंतर्द्वंद्व को ‘पांडे का बयान’ कहानी बयां करती है। इसमें तिरलोचन पंडित आखिर राजधानी में बसने का निर्णय लेते हैं। क्‍योंकि उनकी शर्तों पर गांव उन्‍हें जीने नहीं देता और जात ही गंवानी है तो राजधानी में गंवाएंगे।
पांडे का बयान पढकर अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह की एक कहानी याद आती है जिसमें दिल्‍ली में बसं पंडित जी की पार्टी में कोई नहीं आता तो घी के बने लड्डू वे सुबह को पडोसियों को भिजवाते हैं जिन्‍हें पडोसी बासी कहकर लौटा देते हैं।
‘वधस्‍थल से छलांग’ सुलभ की एक महत्‍वपूर्ण कहानी है जो मिडियाकरों की दुनिया में झांकने का प्रयास करती संपादक और पत्रकारेां के रिश्‍तों की पडताल करती है। क्‍या पत्रकारिता में संपादक हमेशा एक हस्‍तक्षेपकारी नीति के तहत ही बदला जाता है। ऐसे संपादक के नाटकीय क्रियाकलापों को उसकी पूरी रोचकता और संत्रास के साथ उकेरा है कथाकार ने, जिससे यह एक विडंबना की कथा बन जाती है। जिसमें कला और संस्‍कृति का बीट संभालने वाले को जब अपराध का बीट दे दिया जाता है तो क्‍या दिक्‍कतें आती हैं और ऐसा करना किस हद तक जायज है, जैसे सवाल उठते हैं।
क्‍या पत्रकारिता भी राजनीति की शक्‍ल लेती जा रही है, जिसमें कला के जानकार को वित्‍तमंत्री और वित्‍त को जानकार को खेलमंत्री बना दिया जाना एक सामान्‍य घटना है या इसका समाज की सापेक्षता में अपना कोई चेहरा भी है। इस महानगरीय बोध की कथा में भी सुलभ अपनी आंचलिक भाषा को परे नहीं ढकेलते। देखा जाए तो सुलभ की क‍हानियां अपनी संपूर्णता में समाज और व्‍यक्ति के द्वांद्वात्‍मक विकास को रेखांकित करती हैं।


शनिवार, 23 अप्रैल 2016

पंखुरी सिन्‍हा, चंदन पाण्‍डेय और कविता की कहानियां

जैसे विष्‍णु खरे की ताकत को समझने के लिए पाठक से एक सीमित खास तैयारी की उम्‍मीद की जाती है युवा रचनाकार पंखुरी सिन्‍हा की कहानियों का आस्‍वाद लेने के लिए भी कुछ वैसी ही तैयारी चाहिए। क्‍योंकि विवरण की बारीकियों से जिस तरह इन कहानियों की शुरूआत होती है वह शुरू में पाठकों को बोर करती सी लगती हैं पर अगर किनारे पर हाथ पांव मारने से आगे लहरों में धंसने का साहस पाठक करता है आगे गहराई में जाकर भी वह एक निश्चिंतता से तैरते हुए दूसरे किनारे तक आसानी से जा सकता है।
पंखुरी की कहानियां कला फिल्‍मों की तरह प्रभाव छोड़ती हैं,जिनमें क्रियाओं से ज्‍यादा सोचने को दिखाया जाता है। सोच के कई स्‍तर इनमें एक साथ दिखायी पड़ते हैं। कहीं विचार कहीं भाव कहीं इनका द्वंद्व अभिव्‍यक्‍त होता है जिनमें। और जैसे कला फिल्‍में लोकप्रिय फिल्‍मों के नायक आधारित मिथ को तोड़ने की कोशिश करती हैं ये कहानियां भी कथा के रूप या फार्मेट को तोड़ती हैं। कथा के पारंपरिक रूप को जो कहानी सबसे कम तोड़ती है वह  'समानान्‍तर रेखाओं का आकर्षण' है। यह एक लड़की के अपने से कम उम्र लड़के के प्रति आकर्षण की कहानी है। लड़की उसे एक बार प्राप्‍त कर लेती है पर अगली बार लड़क खुद को नियंत्रित कर लेता है। कहानी कई बातों को अपने ढंग से सामने ला पाती है। कहानी दिखाती है कि बाजार किस तरह प्रेम की कंडिशनिंग करता है कि प्रेम आकर्षण की परिभाषा से आगे नहीं बढ़ पाता। दूसरी बात कि बाजार और भूमंडलीकृत दुनिया में एक लड़की की स्थिति में परिवर्तन आया है और अब वह भी अपने प्रेम और आकर्षण को पुरूषों के मुकाबिल उतनी ही ताकत से सामने रख पाने की सामर्थ्‍य रखने लगी है।
पंखुरी की कई कहानियां भारतीय समाज के वैचारिक संकट को भी दिखलाती हैं। यह लेखिका का भी संकट है - कि वह निरूपाय ,अकेली है,संकट को वह देखती है,पहचानती है पर उससे दो-चार होने की ताकत वह अभी जुटा नहीं पायी है। 'शत्रु का चेहरा' कहानी में इसे देखा जा सकता है। संकट यही है कि शत्रु का कोई मुकम्‍मल चेहरा नहीं बनता और यही लेखिका की परेशानी का सबब है। शत्रु का चेहरा ना तलाश पाने की 'कड़वाहट' में कथा नायिका जलूस का साथ नहीं दे पाती और भाग खड़ी होती है। उसे अपने भागने का अहसास भी है -' ... वह भाग ही रही है। जाने कहां से भागकर कहां को जा रही है। जाने किससे भाग रही है।' दरअसल मंजिल हर बार साफ नहीं दिखती,वह सफर में होती है या उसके बाद ही मिलती है। इसलिए मंजिल ना दिखे तेा भागने की बजाय उस राह पर चलना ही सही होगा।पंखुड़ी की कहानियों में विद्रोह और विचार जहां तहां छोटे-छोटे विस्‍फोट के रूप में आते हैं। पर उनमें एक तारतम्‍य या निरंतरता ना होने से वो बदलाव की ताकत नहीं बना पाते और लेखिका को संघर्ष की राह से भागने को मजबूर होना पड़ता है। शत्रु की पहचान के लिए इन विद्रोही स्‍वरों को एक सूत्र में जोड़ना होगा। दरअसल चेहरा तो है ही शत्रु का पर आंतरिक ताकत के अभाव में उसे सामने रखने की हिम्‍मत बटोरनी है लेखिका को।यूं देश और दुनिया के अंतरविरोधों को पूरी जटिलता के साथ जिस तरह ये कहानियां अभिव्‍यक्‍त करती हैं वैसा सामान्‍यत: कविता में होता है। इन्‍हें खोलने की कोशिश में जैसे पूरी दुनिया खुलती चली जाती है।
पंखुरी की कहानियों से गुजरने के बाद चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानियों से गुजरते हुए यह अहसास गहराता है कि हिन्‍दी कहानी धीरे-धीरे अपना चोला बदलती एक नये मुकाम की ओर अग्रसर है। पंखुड़ी के यहां अगर आकलन स्‍पष्‍ट है तो चंदन के यहां कल्‍पना भविष्‍य के आभासी यथार्थ को एक नयी जमीन मुहय्या कराती दिखती है। अपने समय और समाज के अंतरविरोधों को उसके क्रूर चेहरे के साथ सामने ला देने में चन्‍दन की कहानियां समर्थ हैं। इस मायने में वे अकेले से हैं अपनी युवा जमात में।
चन्‍दन की कहानी 'सिटी पब्लिक स्‍कूल, वाराणसी' को ही लें। यह किशोर जीवन पर इक्‍कीसवीं सदी की मार को जिस तरह बहुस्‍तरीयता में पकड़ती है वह विस्मित करता है। पूंजी का क्रूरतम चेहरा, बेचारा स्‍कूल टीचर आज माट साहब से भी ज्‍यादा दुर्गती को प्राप्‍त हो रहा है। और जन्‍म लेने से पहले ही प्रेम की सुकोमल भावनाओं पर आधुनिक पूंजी के दंश को कहानी पढ़कर ही जाना जा सकता है।
कभी शमशेर ने भविष्‍य के होने वाले कवि के लिए के लिए कहा था कि उसे विज्ञान,कला,‍इतिहास और तमाम आधुनिक प्रविधियों की जानकारी होनी चाहिए। युवा कविता के अन्‍वेषियों में तो ज्ञान की वह ललक और उसका प्रयोग नहीं दिखता है पर चन्‍दन जैसे युवा कथाकरों को पढते हुए संतोष होता है कि अपनी तमाम अत्‍याधुनिक सूचनाओं का प्रयोग वे कुशलता से कर पा रहे हैं । पूंजी प्रसूत समकालीन क्रूरताओं का चेहरा दिखाने में चन्‍दन का सानी नहीं है । लीलाधर जगूड़ी की कविता मंदिर लेन और विष्‍णु खरे की कुछ कविताएं पहले यह काम सफलता से करती दिखती थीं, आज वही काम चन्‍दन की कहानियां करती दिखाई देती हैं। उनकी करीब करीब सारी कहानियां इसका उदाहरण हैं।
चंदन की कहानी 'रेखाचित्र में धोखे की भूमिका' का आरंभ तो पंखुड़ी की कहानियों की तरह एक बारीक विवरणात्‍मकता से होता है पर आगे यह अपने समय के मारे गंवई प्रेमियेां की कथा में तब्‍दील हो जाती है। क्रूरता का चेहरा सर्वत्र एक सा है, क्‍या सिटी स्‍कूल और क्‍या गांव-पथार। चंदन की कहानी भूलना व्‍यवस्‍था के अत्‍याधुनिक चेहरे की कठोरता को उसकी गलघोंटू छवियों के साथ सामने लाती है। इसी तरह 'परिन्‍दगी है कि नाकामयाब है' ग्रामीण जीवन में जमीन जायदाद के प्रति लोगों के अंधमोह से उपजी दारूण स्थितियों को अपना विषय बनाती है। यह दिखलाती है कि धन कि लालसा कैसे एक स्‍त्री को भी पुरूषों की तरह एक क्रूरतम चेहरा प्रदान करती है। शिवपूजन सहाय ने 'देहाती दुनिया' में लिखा था कि गांव के लोग भोले तो क्‍या भाले जरूर होते हैं। तो ग्रामीणों के इस भालेपन की नोंक इस कहानी के हर पृष्‍ठ पर एक तीखा दबाव बनाती दिखती है।
नये युग में व्‍यक्ति और समाज के अंतरसंघर्षों को उदघाटित करती कविता की कहानियां चन्‍दन के मुकाबले ज्‍यादा सकारात्‍मक हैं। । 'उलटबांसी' कहानी में ही जिस तरह एक मां अंतत: शादी का निर्णय लेती है वह समाज की बदलती अंतरसंरचना की झलक दिखाता है। मां, बाप, पिता, पति आदि तमाम शब्‍द आज नये अर्थ ग्रहण कर रहे हैं। इस कहानी में अपूर्वा सवाल खड़े करती पूछती है - 'नदियां बदलती हैं आपना रास्‍ता,फिर मां से ही अथाह धीरज की अपेक्षा क्‍यों .... मां पर्वत नहीं थी और पर्वत भी टूटता है छीजता है समय के साथ-साथ'।
यहां यह खयाल कितना वाजिब है कि आखिर क्‍यों प्रकृति के जड़ संबोधनों को जीवित करने में आदमी अपनी भावनाओं-विचारों की हत्‍या कर खुद को पत्‍थर में तब्‍दील कर दे। कथा में एक मां पहली बार निर्णय लेती है अपने जीवन में और चाहती है कि उसके बेटे उसका साथ दें। बेटे साथ नहीं देते पर समय साथ देता है। तभी तो मां के पत्‍थर होते जेहन में इस तरह का विचार पहली बार वजूद में आता है । और चारों ओर के पथरीले आवरण को तोड़ अपनी जगह बनाता है। आखिर ये विचार भी तो मां की संतानें हैं अन्‍य भावनाओं की तरह। हिन्‍दी कविता में युवा कवि पवन करण की पहचान ही इस तरह के आधुनिक सवालों को स्‍त्री के संदर्भ में उठाने के चलते बनी है। कविता की कहानियां उसी बात को शिद्दत से रेखांकित कर पाती है।
कविता की कहानियां प्रेम और उससे पैदा उहापोह की कहानियां हैं। प्रेम को लेकर जो विचार प्रेमीजनों के दिलो-दिमाग को मथते रहते हैं उनका एक दर्शन प्रस्‍तुत करती हैं कहानियां। जैसे कि - प्‍यार सच्‍चा हो तो बड़ी से बड़ी बात छोटी लगती है , या प्रेम वह है जिसकी खातिर आदमी खुद को आमूल-चूल बदल डाले। कहानी लौटते हुए  हेा या आशिया-ना सबका मुख्‍य बिंदु प्रेम की उहापोह ही है। 'आशिया-ना' प्रेम में बिना विवाह किए सहजीवन में रहने से नये जोड़ों के सामने आई समस्‍याओं को लेकर बुनी गयी कहानी है। कि सहजीवन की परेशानियां प्रेमियों को दर-बदर करती हैं पर आशा है कि दूर के तारे की तरह टिमटिमाती रहती है।
 पंखुरी सिन्‍हा के यहां जीवन जगत का आकलन है तो कविता के यहां प्रेमियों के मनोजगत की छानबीन। यथार्थ भी जहां तहां पांव पसारता है पर एक उधेड़बुन चलती रहती है। कविता की कहानियां प्रेम पर एक जिरह छेड़ती हैं , एक अनंत जिरह। 'जिरह:एक प्रेमकथा' का एक पात्र जिरह करता कहता है - दरअसल कहानी और जिन्‍दगी दो अलग-अलग चीजें हैं, दो अलग-अलग धरातल हैं । मैं चाहता हूं कि उनके बीच का यह फेंस टूटे। शायद कविता आगे अपनी कहानियों में यह फेंस तोड़ सकें।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

संदीप मील की कहानियां - कुछ नोट्स

 1.
अच्‍छी कविता वह है जिसे फिर से पढने को कहा जाए और अच्‍छी कहानी वह जिसे पढकर पाठक दूसरे से कहे कि यार आज एक कहानी सुनाता हूं। कहानी किसकी। एक मुल्‍क में जमीं अमर जड परंपराओं की, अंधी आस्‍था की, राजस्‍थानी लोक की, संदीप मील की।

संदीप की कहानियां एक खिलंदडापन लिए होती हैं, किस्‍सागोई की शैली में। उनकी एक छोटी सी कहानी है- 'एक शर्त'। उसे पढते लगा कि लोग करोड़पति बनते नहीं हैं बल्कि खुद कंगाल बनने की शर्त पर दूसरों को करोडपति बनाते हैं। कि करोडपति बनने के सपने से ज्‍यादा मूर्खता भरा सपना कोई और हो ही नहीं सकता। इसीलिए व्‍यवस्‍था करोडों लोगों को करोडपति बनाने के स्‍वप्‍न दिखाती है। कि उनके सपनों की फसल काटकर कुछेक करोडपति बन सकें। ‘ एक का तीन ’ कहानी भी बताती है कि कैसे तमाम लोगों में बैठी पूंजी बढाने की लालसा का फायदा उठाकर देशभर में कुकुरमुत्‍तों की तरह बाबा लोग पैदा हो रहे हैं, कुछ पकडे भी जा रहे। इस कहानी के आरंभ में कहानीकार लिखता भी है – 'आज हर काम में लालच की एक भयानक परत जमी है जिससे हरदम बेइमानी की बू आती है।'

हालांकि यह लिखने की जरूरत नहीं थी क्‍योंकि कहानी इस बात को सफलतापूर्वक सिद्ध करती है। कहानी में एक पंक्ति है – 'तब बाबा जी ने पूंजीको धर्म में ही निवेश करने की बात सोची क्‍योंकि इसका सूचकांक गिरता नहीं।‘ यह भारतीय लोकजीवन का सार्वजनिक तथ्‍या है। धर्मांध लोक ही तमाम बाबाओं की शरणस्‍थली है।

लोक को आधार बनाकर लिखी कहानियों की विशेषता होती है उनका मुहावरा और व तंज का अनोखा स्‍थानीय ढंग। संदीप की छोटी कहानियां भी अपने संवादों के माध्‍यम से जिस तरह वर्तमान समय की विडंबनाओं को परिभाषित करती चलती हैं, वह ध्‍यान खींचता है। ‘ कितने माणसे ‘ कहानी में धनु बोलता है – 'देख बेटा, राजनीति कसाई का बकरा है जिसे एक दिन कटना ही पडता है। मगर जबतक न कटे तब तक राज रस सबसे प्‍यारा रस होता है। जितना निचोडो उतना ही मीट्ठा होता जाता है।‘ यहां राजनीति की क्षणभंगुरता और उसके बावजूद उसके प्रति अंधप्रेम को जिस भाषा में कहानीकार कह रहा है वह उसकी ताकत को दर्शाता है। हालांकि कहानी की थीम वही है जो टैगोर के प्रसिद्ध उपन्‍यास गोरा की है। पर लोक भाषा में उसके जो रंग उभरते हैं वो कहानीकार की अपनी खूबी है।

कहानीकार की मानव मनोविज्ञान की समझ भी अच्‍छी है। 'लुका पहलवान', 'मन्‍नत', 'झूठी कहानी' आदि ऐसी कहानियां हैं जो मानव मन के कई पहलुओं को उजागर करती हैं। सचमुच के संसार के मुकाबिल आज एक साइबर संसार भी कायम होता जा रहा है। मन्‍नत इन दोनों संसारों की टकराहट की भी कहानी है। जो दिखलाती है कि किस तरह सचमुच के संसार से टकरा कर सायबर संसार ढेर हो जाता है।

इन कहानियों में कहानिकार का खिलंदड़ापन जिस तरह सामने आता है वह उसकी ताकत है, अगर वह उसका बेजा इस्‍तेमाल ना करे। कुछ कहानियों में इस खिलंदडेपन का इस्‍तेमाल जिस तरह झटके से करता हुआ कहानीकार कहानी खत्‍म करता है, उसे लेकर थोडी चिंता होती है। खेल तो ठीक है पर खेल के अंत तक खेल भावना का निर्वाह भी जरूरी है। मंजे कहानीकार की तरह पेश आने की कहानीकार की जल्‍दबाजी को थोड़े धैर्य की जरूरत है।



2.

संदीप के दूसरे कहानी संकलन 'कोकिला शास्‍त्र' की शीर्षक कहानी 'कोकिला शास्‍त्र' को पढते हुए लगा कि जैसे संदीप हिंदी में अपने तरह के एक अलग ही जादुई यथार्थवाद की रचना करने वाले कहानीकार हैं। संदीप की कहानियों का तो मैं पहले संग्रह से ही मुरीद हो गया था पर नये संग्रह की इस पहली अपेक्षाकृत लंबी कहानी को पढते हुए मेरे लिए उनका आकर्षण और बढ गया। जादू तो संदीप की कहानियों का स्‍वभाव है। जो पाठकों के सर चढ बोलता है। पर संदीप का जादू ठोस को हवा करने वाला जादू नहीं है बल्कि इसके उलट उनका जादू हवा होते जीवट को लेकर यथार्थ में अनंत आशा की रचना करता है। उनके जादू की परतों पर परतें जैसे जैसे खुलती जाती हैं। उसकी हर परत से जैसे एक नया आशाओं से पूर्ण यथार्थ जाहिर होता जाता है।

'वारेन हेस्टिंग्‍स का सांड' जैसी कहानी में अगर उदय प्रकाश का जादुई यथार्थवाद इतिहास की परतें खोलता है तो संदीप का जादुई यथार्थवाद कहानी 'कोकिलाशास्‍त्र' की परतों में भविष्‍य के दर्शन कराता है। स्‍पष्‍ट है कि यह भविष्‍य स्त्रियों के जीवट, उनकी आजादी की ईच्‍छा और कोशिशों में ही छुपा है जिसे यह कहानी अंत में जाहिर करती है।

कोकिलाशास्‍त्र का समर्पण और प्रस्‍तावना जैसा जो कुछ लिखा है संदीप ने उसमें भी स्‍त्री को लेकर पारंपरिक नजरिये पर चोट की गयी है। समर्पण में मां को याद करता कथाकार कहता है कि ' मां को किताब समर्पण का मर्दों वाला अर्थ समझ में नहीं आता' क्‍योंकि वहां 'समर्पण के नाम पर सदियों की' गुलामी दी जाती है।

अपनी प्रस्‍तावना का शीर्षक भी संदीप ने 'बेडि़यां चबाती औरतें' दिया है। इसमें वे लिखते हैं - ' ...औरतें एक साथ बेडि़यां चबा रही हैं।' ...क्‍या आपको भी ये आवाजें सुनाई दे रही हैं'। हालांकि प्रस्‍तावना में भावुकता हावी होती दिखती है और अंत में कथाकार पुरूषार्थियों सा एकतरफा फैसलाकुन अंदाज अपनाता दिखता है, पर उसकी पीड़ा स्‍पष्‍ट है जिसे कोकिलाशास्‍त्र और अन्‍य कहानियां साफ जाहिर करती हैं।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

एकांत श्रीवास्तव -अध्यात्म का पुट

बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों का असर अब हिंदी कविता पर पड़ता दिखाई देने लगा है। तभी तो एकांत श्रीवास्तव जैसे युवा कवि यात्रा का महूरत देखने लगे हैं। अपने तीसरे संग्रह ‘बीज से फूल तक’ की कविता ‘सगुन’ में वे लिखते है-
मल्लाहों ने पतवार उठा लिए हैं खोल दी हैं घाट पर बंधी नावें किस समुद्र में डूबी पड़ी हैं हमारी नावें कि यात्रा का यह बिल्कुल ठीक सगुन है। 
कवि यहाँ चाहता तो ‘सगुन’ की जगह ‘समय’ का भी प्रयोग कर सकता था। देव, ईश्वर, प्रार्थना, स्वर्ग, पाताल, प्रलय आदि शब्दों का जिन संदर्भों में एकांत प्रयोग करते हैं, वह उनकी राजनीतिक दृष्टि की बाबत साफ-साफ कहता है। ‘सत्य की खोज की कथा’ शीर्षक कविता में वे पाते हैं कि सत्य का राहुल, यशोधरा और बुद्ध से कोई नाता नहीं है। बल्कि वह तो हमारे आसपास ही था जिसे हम पहचान ना पाने के चलते बचते फिर रहे थे। देखा जाए तो राजनीति के क्षेत्र में परंपरा और सत्य के अन्वेषियों ने ‘हस्तिनापुर’ पर कब्जा प्राप्त कर लिया है पर साहित्य में अभी ऐसा हो नहीं पाया है पर एकांत इस मामले में आश्वस्त हैं और अपनी कविताओं को विजयी होने की शुभकामनाएँ देते हैं। वे चाहते हैं कि ये कविताएँ ‘पांडवों की तरह छिने हुए हस्तिनापुर को’ पुनः प्राप्त करें। 
प्रकृति के जीवंत दृश्य एकांत की कविताओं में प्रभावी ढंग से आते रहे हैं, यहां वे अपनी ताकत के साथ मौजूद दिखते हैं। ‘जो कुरुक्षेत्र पार करते हैं’ शीर्षक कविता की आरंभिक पंक्तियाँ इस माने में ख़ूबसूरत हैं- बिना यात्राओं के जाने नहीं जा सकते रास्ते ये उसी के हैं जो इन्हें तय करता है चांद उसी का है जो उस तक पहुँचता है..।
एकांत के पास कुछ मार्मिक कविताएं हैं- ख़ून के तालाब में डूब कर तड़पते हुए उसने इच्छा की होगी कि उसका सिर मां की गोद में हो...।
एक लंबी कविता ‘कन्हार’ में कवि अपनी स्मृतियों के सहारे लोक जीवन के संकटों को चिह्नित करता है और उनके छीजते जाने को लेकर दुख व्यक्त करता है। शहरीकरण और बाज़ारवाद के विषमतामूलक प्रभावों के प्रति कवि काफी संवेदनशील है। वह चिन्तित है कि चीज़ों की कीमतें जहाँ आकाश छू रही हैं, वहीं आदमी का बाजार भाव गिरता जा रहा है। 

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

उपेेन्द्र चौहान - आततायियों के तर्क

हाल की कविताओं में उपेन्द्र चौहान ने देश-दुनिया के अंतिम आदमी को अपनी कविता के केन्द्र में रखा है, आदिवासी, मजदूर उनके नायक हैं। पर ये वे मजदूर नहीं हैं जो प्रतिरोध की किसी राजनीतिक परंपरा से जुडे हों, ये वे हैं जो सबसे निचले पायदान पर पिस रहे हैं जिनकी जरूरतों को कोई उनकी जमीन पर जाकर समझने को तैयार नहीं है, हिन्दी के कवि भी आदमी की इस जमात से अनभिज्ञ हैं। उपेन्द्र की इन कविताओं में सामन्यतया नायक नहीं हैं, और उन्हें राह दिखानेवाला भी कोई नहीं है। दश्‍ारथ माझी इसके अपवाद हैं जो उपेन्द्र के इकलौते नायक हैं। पहाड काटकर रास्ता निकालने वाले बिहार गया के दशरथ मांझी दुनिया में मानव श्रम और जीने की इच्छा की अकेली मिसाल हैं। ‘दशरथ मांझी’ कविता में उपेन्द्र लिखते हैं - दुनिया की सारी प्रेम-कथाएँ बासी पड़ चुकी हैं।
दशरथ की पत्नी को पहाड के बीच का दर्रा पार करते चोट लगी थी उसी से प्ररित हो दशरथ पहाड काटने के काम में लग गए थे। पत्नी इस बीच चल बसीं पर दशरथ का पहाड काट कर रास्ता बनाने का जज्बा खत्म नहीं हुआ। दशरथ की प्रेमकथा बासी इसलिए नहीं पडी क्योंकि वह प्रेम के साथ श्रम और अटूट धैर्य की भी कथा है। हालांकि हिन्दी के चर्चित कवि अरूण कमल दशरथ मांझी को नायक नहीं मानते उनके अनुसार - ‘दशरथ मांझी का श्रम एक व्यक्ति का था,समूह का नहीं ,इसलिये वह नायक नहीं थे’। क्या अरूण कमल बताएंगे कि किसी भी व्यक्ति, चाहे वो कैसा भी नायक हो उसका श्रम एक समूह का श्रम कैसे हो सकता है .. ।
उपेन्द्र की इन कविताओं में दुनिया भर के आदिम समाजों में जारी सकारात्मक और नकारात्मक तौर-तरीकों को जगह दी गयी है। जैसे एक कविता है बिठलाहा जिसमें संथाली समाज में बलात्कारी को दी जाने वाली सजा का विवरण आता है कि किस तरह से बलात्कारी के घर को संथाली समाज के लोग खत्म कर देते हैं और उसके परिजनों को गांव-समाज से बाहर कर देते हैं, बलात्कारी तो जान बचाकर पहले भाग ही चुका होता है, संथाल समाज के बालत्कारियों को दंडित करने के तौर-तरीकों से चाहे तो हमारा तथाकथित आधुनिक समाज सीख सकता है -
क्या तूने कहीं सुना है
देखा है... ऐसा कोई समाज
जो इस तरह हो खड़ा
दुराचार के खि़लाफ़!
चीन , कनाडा, इंडोनेशिया आदि के आदिवासी समाजों में प्रचलित कुप्रथाओं को भी अपनी कई कविताओं में अभिव्यक्त किया है उपेन्द्र ने। भारत में आज भी जहां-तहां से नर बलि की बीभत्स घटनाओं की खबर आती है जबतब। डायन कहकर भोली-भाली औरतों को आज भी झारखंड और बिहार में ओझा-गुणी अपना शिकार बना रहे हैं। अशिक्षा और कुंठाओं से उपजी इस तरह की क्रूरता के कई प्रसंग हैं यहां जो हमें विचलित करते हैं-
क्वाँरी लड़की का माँस उबालकर खाने से
कोई आदमी उड़ नहीं सकता
क्या तुम्हारा अपरिपक्व मस्तिष्क
इतना समझ नहीं सका
या

सैंडी कोई अलग से शैतान का अस्तित्व नहीं होता
आदमी ही किंवा शैतान हो जाता है

या

क्या सचमुच बलि से देवता हो जाते हैं ख़ुश
तब ऐसा क्यों नहीं करते
उस देवता की ही बलि दे देते
ताकि वह देवता हो जाए और ख़ुश!
या
युवतियों को ख़रीदकर फिर उनकी गर्दन दबाने में
तुम्हें कितना वक़्त लगता है जेंग डांगेपन
0 0 0
पुलिस बाबू,
हम तो केवल माँग की पूर्ति करते हैं-
लोग तो बस ख़ूबसूरत और जवान दुल्हनें चाहते हैं
कोई लड़की कैसे मरी या मारी गई
इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं, बाबू!
आख़िर किसी लड़की को
एक-न-एक दिन मरना तो है ही...!

अमानवीयता के कैस-कैसे तर्क हो सकते हैं आततायी समाज के यह इन कविताओं से गुजरते हुए महसूस किया जा सकता है। आततायियों के ऐसे तर्क केवल आदिम समाजों में ही नहीं मिलते आधुनिक समाजों में भी ये उसी तरह फल-फूल रहे हैं, गुजरात में हुए दंगों के पीछे के आततायियों के तर्क को हम इन सबसे अलग कैसे कर सकते हैं पर वहां के रहनुमा हैं कि  गुजरात की आधुनिकता और विकास के दावे करते नहीं थकते। देखा जाए तो यह आततायीपन दुनिया भर में नकाब के पीछे आज भी जीवित है, उसका चोला भले अलग हो पर हर जगह उसकी अमानवीयता एक सी है, उसके शिकार एक से हैं। उनका कालाजादू आज भी वैसा ही चल रहा है, आज भी आसराम बापू जैसे के आश्रम में इस कालाजादू के शिकार बच्चों की लाशें मिलती हैं। उपेन्द्र भी इससे अवगत हैं -
इवे कबीले की कुमारी
दात्सोमोर अकू
तुम
केवल घाना के बोल्टा क्षेत्र में ही नहीं हो

मैंने तुम्हें जहाँ भी ढूँढ़ा-वहीं पाया
अफ्रीका में
लैटिन अमरीका में
एशिया और यूरोप में।
इन कविताओं में उपेन्द्र ने पीडा के और भी कई प्रसंग उठाए है, क्लाड इथरली से लेकर रत्नाबाई काणेगांवकर तक, वे पाठकों को व्यथित करते हैं। आहत मनुजता के यह तमाम प्रसंग हमें सोचने को विवश करते हैं कि क्या इक्कीसवीं सदी सचमुच विज्ञान या विकास की सदी है या मध्ययुगीन कालिमा  अपनी काली उंगली उठाए हमारे भाल को आज भी कलंकित कर रही है। क्योंकि इस आधुनिक और विकासोन्मुख सदी में भी सडक पर एक प्रसवपीडिता हमारे रहनुमाओं के काफिले के गुजरने के इंतजार में अपने अजन्मे बच्चे के साथ काल-कवलित हो जा रही है। उपेन्‍द्र की एक लंबी कविता कार्यकर्त्ता  है जिसमें कवि ने राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं के दुख को जबान दी है। कार्यकर्त्ताओं पर हिन्दी में संभवतया यह पहली कविता है जो उनके पक्ष को सामने रखने की कोशिश करती है। उपेन्द्र कवि के साथ खुद एक राजनीतिक कार्यकर्त्ता भी रहे हैं और इस कविता को उनका निज के साथ साक्षात्कार माना जा सकता है-
हर जगह लड़ रहे हैं कार्यकर्त्ता!
मर रहे हैं कार्यकर्त्ता!
उनके ख़ून से अभी तक माटी में है ललाई
नेता बन रहे ख़ून सोख्ता!
इस ढ़लती उम्र में अभी तक
जो रह गये हैं केवल कार्यकर्त्ता
उन्हीं के संघर्ष से कहीं पक रहा है लोहा
और बन रहे हैं औज़ार
और हो रही तैयारी- किसी युद्ध की!

रविवार, 31 जनवरी 2016

राजीव पांडे - यथार्थ तक जाने की पहलकदमी

‘पहाड़ों पर घूमते हुए/मैं अक्सर सोचता हूं/जीवन की खुशीका इजहार करते हुए/घाटी के इन सुंदर फूलों को तोड़ लूं/बिखेर दूं बीज उनके/शहर के हर घर की/छोटी सी फुलवारी में/जहां/इन्सानियत की पौध/उगने का नाम ही नहीं लेती।’
राजीव पांडे की उपरोक्त पंक्तियां बतलाती हैं कि कवि किस कदर बेचैन है। इन्सानियत की पौध को विकसित करने के लिए। राजीव हृदय रोग चिकित्सक हैं और उनकी कविताएं प्रमाणित करती हैं कि वे साहित्यिक अर्थों में भी विशाल हृदय रखते हैं। वे सीधे जीवन के यथार्थ तक जाने की पहलकदमी करते हैं और उनके निष्कर्ष पाठकों को विचलित करने वाले हैं। 
‘कुछ अपवादों को छोड़कर/ऐसा लगता रहा है/भूख ने भूख को ही डसा है।’ पारिवारिक आत्मीयजनों को लेकर भी कुछ कविताएं हैं, संग्रह में। भाई को लेकर इधर एकांत श्रीवास्तव व बोधिसत्व ने मार्मिक कविताएं लिखी हैं। राजीव की एक कविता ‘जब बड़े भैया को नौकरी मिलेगी’ भी भारतीय निम्न मध्यम वर्ग की त्रासदियों को सामने लाती हैं-‘छनकर आती लालटेन की रोशनी/जिस दिन तेज हो जाए/समझ भैया को नौकरी मिल गई’ । यहां यथार्थ तक जाने की और उसे रेखांकित करने की जद्दोजहद तो दिखती है, पर अक्सर वह सपाट या कठोर यथार्थ के रूप में सामने आती है। अगर कवि यथार्थ को उसकी द्वंद्वात्मकता में पकड़ने की कोशिश करे तो आगे और आशा की जा सकती है। धूमिल भी उतरप्रदेश से थे। धूमिल का प्रभाव कहीं-कहीं कौंध की तरह दिखता है कवि में। एक जगह
इसे कवि ने स्वीकारा भी है। ‘आम आदमी’ को लेकर इधर कई तरह की टिप्पणियां सामने आ रही हैं, कवि की टिप्पणी भी ध्यान खींचती है। 
 ‘आम आदमी की कविता/किसी भड़वे के नपे-तुले कदमों के पीछे/रंडी के कोठे तक पहुंचे हुए/एक भद्र पुरुष का ठिठका हुआ कदम भर है-’ आम आदमी को लेकर ऐसी टिप्पणियां अंततः फिकरेबाजी में बदलकर रह जाती हैं। धूमिल के यहां भी यह गड़बड़ी है। जीभ और जांघ के भूगोल से कविता में बहुत कुछ हासिल नहीं किया जा सकता, सिवा क्षणिक उत्तेजना पैदा करने के। यूं सच के साक्षात्कार से कवि भाग नहीं रहा है, यह महत्वपूर्ण है ‘सच है/सुलगती हुई लकड़ियों के बीच/चांदी के बिछुओं और सोने की बाली की तलाश।’

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

विनय विश्वास - बढ़ते अंधेरे की पहचान

मध्यवर्गीय जीवन में बढ़ते अंधेरे की सही पहचान है विनय को। एक जिल्लत में बदलती जाती रोजमर्रा की जिंदगी की घुटन व त्रास को वो शिद्दत से अभिव्यक्त कर पाते हैं-
अंधेरे इतने फैल गए घरों में कि जगह नहीं बची रोशनदानों को/चोरियों ने बंद कर दिए/रोशनी और हवा के रास्ते/हम भूल गए कि दम घुटना कहते किसे हैं...
दरअसल विनय में एक वाजिब जिंदगी जीने की तड़प है और जीने के अवसरों की लगातार कटौती से वह बुरी तरह परेशान हैं। वह देख रहे हैं कि किस तरह हवा-पानी-धूप का मिलना मुहाल होता जा रहा है और अंधी करने वाली एक चौंध चहुंओर फैलती जा रही है, जो उन्हें लाजवाब करती जा रही है। हालांकि खुद मिटकर भी रोशनी पैदा करने का कवि का जज्बा मरा नहीं है: 
हमें मारकर भी/डर भर गया/अंधेरों की हाड़-हाड़ में/मिटे भी ऐसे कि दूर तक उगते चले गए/उजाड़ में।
नया कवि अपने लिए नई जमीन तोड़ता है तब ही उसे जुदा पहचान मिलती है। ऐसी नई अनुगूंजें विनय की कविताओं में भी हैं। आविष्कार, मेहनत, कुसूर, देहाती आदि ऐसी ही कविताएं हैं।
विनय की बहुत-सी कविताएं सपाटबयानी-सी हैं, वे कहीं-कहीं स्थितियों की व्याख्या करती लगती हैं और कहीं एक्सपर्ट कमेंट कर रह जाती हैं। ‘भूतपूर्व’, ‘अन्नदाता’, ‘धन्य’, ‘कार्रवाई’ आदि कविताओं को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।
दुख-दर्द-पीड़ा को हथियार बना लेना भी कवि को आता है , विनय ऐसा सफलतापूर्वक कर पाते हैं, दर्द को दवा बन जाने की हद तक जज्ब करना यह सीख रहे हैं। विनय में जीवन के कई रंग हैं, प्रकृति को व जीवन की जमीनी सच्चाईयों को बचाने व उनके लिए जूझने का साहस व विवेक भी उनके पास है, हिंदी कविता उनसे आशा कर सकती है।

रविवार, 17 जनवरी 2016

अंकुर मिश्र - राह दिखाता लैंपपोस्ट

किसी सितारे का तार टूटने पर भी 
उसे बजाया जा सकता है, 
मगर तभी जब तुम सागर के मध्‍य 
की खोज में निकलने की हिम्मत करो
अंकुर की कविताएं उद्दाम साहस से धाराओं का रूख बदलने की हिम्मत रखनेवाले युवा की कविताएं हैं। इस साहस का आधार संवेदनशील दृढता है, जो विवेकपूर्ण ढंग से परंपरा और आधुनिकता को नये सिरे से व्याख्यायित करना चाहती है – 
क्या पत्थर मजबूत है 
मजबूती के ढोंग ने दिया भगवान 
और कमजोरी के ढोंग ने दिया इंसान 
और अपने ढोंग का वजन कमर पर लादे 
हमारे बाल उलझ रहे हैं 
संघर्ष के समय अंकुर चरम प्रतिरोधी रूख अपनाते हैं। प्रतिरोध के चरम क्षणों में वे विचलित होते हैं, भटकते हैं और अपने अस्तित्व को फिर फिर तलाशने की कोशिश करते हैं –
मैं उन गहराइयों और उंचाइयों के 
निर्वात में चकाचौंध 
अपने अस्तित्‍व की तलाश में 
भटक रहा हूं
अपने प्रतिरोधी क्षणों में वे परित्यक्त, जमातों में भी नये निर्माण की संभावनाएं तलाश लेते हैं - 
रंडियों की खुली टांगें 
जो चाहें तो पैदा कर दें धरती, पाताल और 
उससे आगे भी 
अंकुर को किसी भी रूप में हार स्वीकार नहीं है -
और अंत
और मृत्‍यु 
मुझे जनमना है। 
कवि का प्रतिरोधी धारा के विरूद्ध उडान का जज्बा युवकोचित है, जो ख्वाबों की वीरानी में छलांग लगाकर काले-सफेद का फर्क पता करना चाहता है। उसके लिए उडने की चाह, सच्ची चाह है, चाहे वह उडान मौत की अंधी गुफाओं की ही क्यों न हो। प्रतिरोध के चरम पर कवि ताकत को चूकता पाता है कबड्डी का खेल बहुत खेला 
अब अपाहिज महसूस करता हूं 
ऐसे में अपने भीतर ही कोमल स्‍वरों की तलाश करता है वह –
काश कि मैं होता सुर
सुर्ख लाल रंग बहुत पसंद है अंकुर को - 
क्योंकि सुर्ख ही है रंग हमारे गर्म खून का। 
एक कविता में नीले रंग को भी बहुत सराहता है वह। वह उसकी अकांक्षाओं का नीला रंग है जिसे वह खोज निकालना चाहता है अंतरात्‍मा की परछाईयों में। इस नीले रंग में भी लहू के लाल रंग की सुर्खी छुपी है , क्यों कि यह नीला रंग होगा - 
कलम से लहुलुहान कागज की रेखाओं में। 
यहां लाल रक्त ही गहराता नीला हो जाता है।
कई बार अंकुर के चरम प्रतिरोध को जब राह नहीं मिलती तो पहले वह पूरी ताकत से चोट करता है। ऐसे में वह प्रतिरोध को आत्म हनन की सीमा तक ले जाता है - 
निकले हुए खून की जडों में कूदना 
हमारे पास अब सिर्फ यही एक चारा है। 
हैमरेज। 
फिर एक तरह के तिलस्म में वह अपनी अपेक्षाओं को रहस्य मय ढंग से छुपा देता है –
दीवारों पर लाल पेशाब के छींटे 
और उसको मधुमक्‍खी की तरह 
चाटते लोग। 
भावनाओं में बह जाने को शमशेर कमजोरी मानते हैं और स्‍वीकारते भी हैं कि अक्सर तो बह ही गया मैं। भावना को लेकर मुक्त्बिोध का रवैया ज्यादा सख्‍त है। उनके अनुसार भावनाएं बच्चा हैं और अगर तुम उन्हें आदमी नहीं बना सकते तो उन्हें मार डालो। वरना वे विकृत रूप ले लेंगी, राक्षस हो जाएंगी। भावना की इन विकृतियों से अंकुर का भी साक्षात्काहर होता है - 
भावनाएं वेश्‍या बन गई हैं। 
इन्‍सान का मांस बाजार में खूंटों पर टंगा है , 
और हम झूठे महोत्‍सवों के झूठे रंगों में 
अठखेलियां कर रहे हैं। 
कई जगह कवि अपने चरम उद्दाम आवेग को अपने वश में कर लेता है और तब उसे लगता है कि कर्ण, कृष्ण - मार्क्स, माओ से बेहतर है दूसरे को राह दिखाने वाला लैंपपोस्ट बन जाना। अपना अस्तित्व तलाशता कवि कभी आग हो जाता है, कभी पानी बन जाता है और कभी दोनों के संतुलन से एक नयी राह तलाशने को बचैन दिखता है।